Halting Pakistan-India Nuclear Arms Race - Hindi

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पाकिस्तान-भारत के बीच परमाणु हथियारों की होड़ को रोकना

जे.सी. सुरेश
IDN - इनडेप्थ न्यूज रिपोर्ट

टोरंटो (IDN) - दक्षिण एशिया के दो दीर्घकालिक प्रतिद्वंदी, भारत और पाकिस्तान दुनिया की सबसे सक्रिय परमाणु हथियारों की होड़ में लगे हुए हैं। अनुमान है कि भारत ने लगभग 100 परमाणु हथियारों का निर्माण किया है और माना जाता है कि पाकिस्तान ने भी इससे अधिक नहीं तो कम से कम इतनी ही संख्या में परमाणु हथियारों का जखीरा तैयार कर लिया है।

लेकिन परमाणु विश्लेषक हैंस एम. क्रिस्टेंसन और रॉबर्ट एस. नोरिस के अनुसार पाकिस्तान (इस्लामाबाद) किसी अन्य देश की तुलना में कहीं अधिक तेजी से वारहेड (युद्धक)-श्रेणी की परमाणु सामग्री के भंडार को बढ़ाता जा रहा है; वास्तव में अगले दशक तक यह संख्या 200 परमाणु हथियारों का आंकड़ा भी पार कर सकती है।

इसके साथ ही इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य एवं परमाणु विश्वास-बहाली के उपायों (सीबीएम) पर वर्षों की वार्ता भी हथियारों की क्षेत्रीय होड़ और द्विपक्षीय संबंधों में समय-समय पर होने वाले भड़काव को रोकने में विफल रही है।

भारत और पाकिस्तान किसी भी परमाणु दुर्घटना के लिए एक दूसरे को सतर्क करने पर सहमत हो गए हैं। दोनों देशों ने एक-दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला नहीं करने और वर्ष में एक बार ऐसे स्थानों की गुप्त सूचियों का आदान-प्रदान करने का वादा भी किया है। लेकिन इन सीमित आश्वासनों से दोनों पक्षों के बीच हथियारों की दौड़ को जारी रखने से नहीं रोका जा सका है।

इस वर्ष की शुरुआत में भारत ने अपनी अत्यधिक प्रचारित अग्नि 5 बैलिस्टिक मिसाइल का पहला परीक्षण प्रक्षेपण किया, जिसकी मारक सीमा एक आईसीबीएम (ICBM) के आसपास की है।

समझा जाता है कि भारतीय सेना भी अपनी पहली परमाणु-हथियारों से लैस बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी हासिल करने से लगभग एक वर्ष दूर है। एक बार जब आईएनएस अरिहंत समुद्री गश्त शुरू कर देता है तो भारत के पास एक पूर्ण परमाणु त्रय होगा जो देश को भूमि, हवा या समुद्र से परमाणु अस्त्रों के प्रक्षेपण की क्षमता प्रदान करेगा।

पाकिस्तानी सेना ने भी कई कम-दूरी की परमाणु-सक्षम मिसाइलों का निर्माण किया है जिनके बारे में विश्लेषकों का मानना ​​है कि इनका लक्ष्य भारत (नई दिल्ली) की पारंपरिक सैन्य श्रेष्ठता का जवाब देना है। अगर भारतीय सैन्य बल पाकिस्तान की सीमा में घुसते हैं तो इन हथियारों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

एक अधिक महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण बनाने का समय

ग्लोबल सिक्योरिटी न्यूज़वायर के स्टाफ लेखक, रशेल ओसवाल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर वाशिंगटन के अधिकारी और विशेषज्ञ यह सोंचने को विवश हैं कि क्या यह "एक नया तथा और अधिक महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण बनाने का समय" है।

हेनरी एल. स्टिम्सन सेंटर में 31 जुलाई को आयोजित एक फोरम में प्रतिभागियों ने भारत और पाकिस्तान द्विपक्षीय वार्ता को पुनर्जीवित करने और अपनी वर्षों की शांति प्रक्रिया को प्राथमिकता से आगे बढ़ाने के लिए उठाये जा सकने वाले प्रतीकात्मक कदमों के लिए कई सुझाव दिए हैं।

उन्होंने कहा कि, प्रारंभिक प्रतीकात्मक गतिविधियों में राष्ट्र प्रमुखों द्वारा एक दूसरे के देशों का दौरा करना और क्षेत्रीय प्राकृतिक आपदाओं के बाद एक दूसरे को मानवीय सहायता उपलब्ध कराना शामिल हैं।

एक फोरम में अपनी प्रस्तुति के दौरान कार्नेगी एंडाउमेंट्स न्यूक्लियर पॉलिसी प्रोग्राम के उपनिदेशक टोबी डाल्टन ने कहा, "कुछ करने की ओर धीरे-धीरे बढ़ने की कोशिश की बजाय आप बेसलाइन (आधार-रेखा) में एक मूलभूत परिवर्तन करने का प्रयास करें।" उन्होंने नए दृष्टिकोण को, भारतीय और पाकिस्तानी सरकार के नेताओं द्वारा द्विपक्षीय शांति वार्ताओं में सार्वजनिक और व्यक्तिगत भूमिकाओं को प्राथमिकता और इन्हें अत्यधिक महत्त्व देने के रूप में परिभाषित किया।

दक्षिण एशिया के दो दीर्घकालिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच स्थायी शांति की संभावनाएं फरवरी 1999 में "लाहौर घोषणा" पर हस्ताक्षर के साथ अपने चरम पर थीं। डाल्टन के अनुसार, उसके बाद तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके भारतीय समकक्ष अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा एक शिखर सम्मेलन किया गया था।

लाहौर समझौते में भारत (नई दिल्ली) और पाकिस्तान (इस्लामाबाद) पहली बार एक दूसरे को बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षणों की अग्रिम सूचना देने और पारंपरिक सैन्य एवं परमाणु हथियारों के मुद्दों पर आपसी विश्वास में सुधार के विकल्पों पर द्विपक्षीय वार्ताओं के आयोजन के लिए प्रतिबद्ध हुए। वार्ताएं इस क्षेत्र और संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए एक राहत के समान थीं जो इस वर्ष के पहले तक दोनों राष्ट्रों के परमाणु परीक्षणों से काफी चिंतित था।

लाहौर प्रक्रिया

"लाहौर प्रक्रिया अब तक के सीबीएम प्रयास की चरम स्थिति थी। डाल्टन ने कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे इसमें वास्तव में सही तरीके से एक बदलाव के रास्ते पर चलने की क्षमता है। हालांकि लाहौर शिखर सम्मेलन के सिर्फ तीन महीने बाद ही पाकिस्तानी सैनिक भारत-नियंत्रित कश्मीर के क्षेत्र में घुस आए। इसके परिणाम स्वरूप हुए लघु युद्ध ने द्विपक्षीय संबंधों में दरार उत्पन्न कर दी और दोनों पक्षों ने नए सिरे से हथियारों के विकास पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया।

डाल्टन के अनुसार, उस समय के बाद की पारंपरिक और परमाणु सीबीएम वार्ताएं काफी हद तक मध्य-स्तर के अधिकारियों के स्तर तक ही सीमित रहीं क्योंकि पाकिस्तानी और भारतीय सरकार के नेताओं ने मुख्यतः आर्थिक मामलों पर ध्यान केंद्रित करने का विकल्प चुना।

कार्नेगी परमाणु विशेषज्ञ का मानना ​​है कि चूंकि दक्षिण एशियाई नेताओं ने सीबीएम के प्रयासों में अधिक व्यक्तिगत रुचि नहीं ली है, इसलिए यह मामला "जोखिम से भागने वाले नौकरशाहों" के स्तर तक ही सिमट कर रह गया और "वार्ताएं किसी सार्थक चीज की शुरुआत करने की बजाय स्वयं में एक उद्देश्य बन गईं।"

डाल्टन ने कहा है कि दोनों देशों की बहुस्तरीय शांति प्रक्रिया के माध्यम से कुछ सकारात्मक लाभ हासिल किए गए हैं: द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि, एक सैन्य हॉटलाइन का नियमित उपयोग और एक बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपण-सूचना तंत्र का पालन।

पूर्व की संयुक्त वार्ता में किसी गलत रणनीतिक अनुमान के कारण परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की संभावनाओं को कम करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए विचार-विमर्श करना शामिल था।

"नाम नहीं बताए जाने की शर्तों पर बात करते हुए विदेश विभाग के एक क्षेत्रीय विशेषज्ञता वाले अधिकारी ने बताया कि, 'ऐसे अनेकों महत्वपूर्ण उपाय हैं' जो भारत-पाकिस्तान के बीच सुरक्षा संबंधों को स्थिर करने में सहायक हो सकते हैं। ग्लोबल सिक्योरिटी न्यूजवायर के स्टाफ लेखक ओसवाल्ड ने लिखा है कि, "यह अधिकारी जो इस मामले पर सार्वजनिक रूप से बात करने के लिए अधिकृत नहीं था, उसने इन उपायों के बारे में विस्तार से कुछ भी नहीं बताया"

ओसवाल्ड कहते हैं "दोनों पक्षों में इस बात पर मतभेद है कि क्या पारंपरिक और परमाणु विश्वास-बहाली के उपायों की चर्चा एक ही छतरी तले की जानी चाहिए"। विदेश विभाग के अधिकारी ने कहा, "इस बात की स्वीकृति बढ़ रही है कि ... एक पक्ष के अनुसार ये मुद्दे सहज रूप से जुड़े हुए हैं और दूसरे पक्ष का मानना है कि ये अलग-अलग मुद्दे हैं और उन्हें अलग-अलग ही रखा जाना चाहिए"। [IDN-इन डेप्थ न्यूज - 8 अगस्त, 2012]

2012 IDN इन डेप्थ न्यूज । महत्वपूर्ण विश्लेषण

 

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